काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"

वजह मेरे लिखने की

अपने और अपने रचना कर्म के विषय में कुछ भी कहने से पहले एक दुविधा जीनी होती है । आज, मैं उसी दौर में गुजर रहा हूँ । दर यह भी ही की सीधे - साधे ढंग से अपनी बात कहता हूँ तो अपनी पड़ताल या इस पड़ताल को व्यक्त करने में कुछ कमी ना रह जाये । ऐसा कुछ छूट न जाये जो मेरे लिखने की वजह विशेष या मेरा मूलभूत सरोकार हो सकता है'। अगर सावधानी'बरतता'हूँ'तो वास्तविकता'में कुछ बनावट ना मिल जाये । कुछ बढ़ - चढ़ कर ना कह जाऊं । बरहाल, मैं स्वीकार करता हूँ की मैंने भाषा'और साहित्य का विधिवत'अध्यन नहीं किया । मैं रसायन शाश्त्र की विद्यार्थी रहा और दो वर्ष अध्यापन का मौका देने'के बाद नियति'ने मुझे इस भारी - भरकम उद्योग में लाकर पटका'। जहाँ मशीनें धड़धड़ा कर देश की जय बोलने जैसी अनुभूति न हो तो मुझे हुई न किसी दूसरे की ऐसी मनोदशा जीते महसूस ही किया । फलाफल के हर्ष - विषाद से हटकर कुछ कर' पाने का संतोष भर होना अलग बात है । यहाँ आदमी यंत्रो को नियंत्रित करता है तो कुछ यंत्र आदमी को पूर्व निर्धारित डरहे पर बनाये रखते हैं । उत्पादन, रोज़गार और आत्म निर्भरता की द्रिष्टि से इन यांत्रिक समीकरणों की अपनी उपादेयता है तथापि यांत्रिकी और प्रदोयोगिकी अभी से हमारे संस्कारों का हिस्सा नही बन पायी है । रसायनज्ञ का मेरे पेशा भी कविता का नाज़ुक प्रकृति के बहुत अनुकूल नहीं लगता तदापि मैं महसूस करता हूँ की अगर मैं इस वातावरण में कविता नही लिख सकता था तो कोई भी माहौल मुझसे कविता नहीं लिखवा सकता था । अतः वहां लाकर पटके जाने का कोई अफ़सोस नहीं है, मुझे । अफ़सोस केवल इस बात का है की मैंने लेखन को बहुत गंभीरता से नही लिया । यहाँ तक की लिखे हुए को सहेजने सवारने की बजाये अपनी मौत मारने के लिए भी छोड़ता गया । इसके लिए मेरा परिवेश, मेरा पेशा नहीं वरन मैं स्वयं जिम्मेवार हूँ । हाँ, जब - जब अभिव्यक्ति के अधिकार को जीने का साहस किआ है मैंने स्वयं को अपेक्षाकृत हल्का और तनाव मुक्त पाया है, इस वास्तविकता के बावजूद की मुझे लिखने में तकलीफ होती हैं, जो कुछ भोगता हूँ या दूसरों को भोगते हुए देखता हूँ उससे भी कहीं ज्यादा तकलीफ क्योंकि मेरे लिए कविता लिखना सोद्देश्य और सप्रयास कार्य है । अतः जहाँ तक बन पड़ा स्वयं को लिखने से बचाय रखा । एक कारन यह भी है की मुझे अपना मंतव्य प्रकट करने के लिए सटीक शब्द प्रायः नहीं मिलते । परिणाम स्वरूप बहुत कुछ अंदर घुमड़तI रहता है, अक्सर कवी, कभी भाव जगत का अजीबोगरीब प्राणी रहा होगा । ऐसे कुछ कवि - जीवो को देखा - सुना भी है । आश्चर्य है की ऐसे कवि - प्राणी आज की हिन्दी कविता में कही नही है । सूझे तो नियति ने किसी प्रकार की नफासत और नज़ाकत जीने का अवसर ही नहीं दिया । जिंदगी के कुछ कड़वे - कसैले यथार्थ से बहुत जल्द मेरा आमना - सामना हो गया था । मैं कविता क्यों लिखने लगा ? मैं समझता हूँ की जिंदगी को समझने की तमीज़ जिस दिन मुझ में विकसित हुई। आदमी के कंधो पर सवार आदमी के प्रति आक्रोश से मेरा शरीर कांपा होगा । मुठिया प्रहार की मुद्रा में भिंची और तानी होगी उसी दिन मैंने पहली कविता लिखी होगी अथवा

लिखने का प्रयास किया होगा । इसके अतिरिक्त भी कविता लिखने की कोई वजह हो सकती है, मुझे नही मालूम । कुछ मित्रो की राय मेरे लिखने का दूसरा कारण मेरा सामाजिक और दफ्तरी जिंदगी में मिस-फिट होना भी है । उनकी राय हो सकती है । फिट होने के लिए आदमी को कभी किसी का तो कभी किसी का झंडा उठाना पड़ता है । संस्कारों का हनन कर हवा के साथ साथ बहने का कौशल ही सिद्ध नहीं करना पड़ता बल्कि कुछ हथकंडो में भी महारथ हासिल करनी पड़ती है । आदतन या संस्कार वंश मुझे किसी झुण्ड का हिस्सा होना स्वीकार्य नही हुआ । हर मेले , हर माहौल मै अपने को एकाकी पाया है. दो- चार छठ साथ रहने वाले यकीनन ऐसा कुछ न दे गए जिसे अक्सर सहलाना ही पड़ा।

हर संवेदन शील व्यक्ति की भांति मूल्यों के संकर्मण की त्रासिदि पूँजीवादी ब्यबस्था के दोष दुर्गुणों की परिडाम आदमखोर , विकृतियों और विसंगति का दंश महसूस करने के अतिरिक्त मजदूर संघठन में काम करते समय श्रमिक वर्ग की कमजोरियों , विवशताओं और अन्तविरोधियो से भी परिचय हुआ| इस प्रकार कविता के जो भी संस्कार मुझे मिले , ज़िन्दगी से मिले! कविता के परंपरागत छंद विधान से द्रोह नही ह परंतु वह मुझे बहुत हद तक सहज होने से रोकता है अतः बहुत आकर्षित नही करता| आधुनिक कविता की अनतयोजना में छंद के परोछ और लय की प्रत्यछ अनिवार्यता तथा लोक जीवन से लिए गए बिम्ब और प्रतीकों का कायल हु| ज़िन्दगी के सरोकारों की अभिब्यक्ति के लिए कविता का लय से द्रोह , असहज होकर शामिल होते अत्या अनुप्रासों से परहेज और आम आदमी की समझ से परे के शिल्प की अनिवार्यता अभी तक महसूस नहीं ह ुई है मुझे! कविता की नियति आदमी की नियति से जुडी हुई है | इस थोपी हुई नियति से पर जाने की झटपटाहट स्वाभाविक है , ज़िन्दगी में भी और कविता में भी| है आम आदमी की नियति और पर जाने की कबत अभिजात्य जीती कविता की नियति से अलग है| इस अंतर को कविता में बनाये रखना वांछनीय ही नही जरुरी भी है| अभी केवल अमानवीय परिस्थितियों के प्रति आक्रोश जिया जा सकता है| ज़िन्दगी के सही ढांचे की तलाश जारी है| जिस दिन ज़िन्दगी , में उसका समावेश हो जायगा कविता रहत की सांस लेगी और मानवीय मूल्यों का समर्थन जीने लगेगी| तब मेरे जैसे किसी आदमी को कविता लिखने की जरूरत नही रहेगी| आज बोलने की जरूरत भी है और आत्मनिर्णय के अधिकार को जीने की भी | खास आदमी के सर्वार्थ के लिए आम आदमी की कुछ जानी पहिचानि बड़ी बड़ी मौते है जिनके आलावा हम रोज अनेक छोटी छोटी मौत मरते हुए भी देखते है| रोजाना की यही छोटी छोटी मौते उसे बड़ी मौतों से लड़ने की सामर्थ नही जुटाने देती | अतः हम या तो बौनापन जीते है, अथवा आक्रोश| जो लोग पेशेवर आशावादी नही है , वह हताश भी| मैंने अपनी कविता को इन सबसे बचाकर रखना आवश्यक नही समझ| मेरी विनम्र समझ से मेरी कविता का शिल्प परंपरागत छंद विधान वाली कविता और आज की अधुनातम कविता के वीच का शिल्प है , और यही मुझे अच्छा भी लगता है | इसका अर्थ यह नही है की मध् मार्ग का समर्थक भी हु | सड़क के वीच चलने के

खातों से परिचित हु और वाई और चलना अपेछाकृत निरापद ही नही मानवतावादी स्वस्थ समाज के ढांचे की इस्थापना के लिए जरुरी बी मंटा हु| लिखने को गीत भी लिखे है वे ग़ज़के भी| मेरा मानना की हिंदी ग़ज़ल को अभी भी अपने शास्त्रीय पृष्ठ भूमि और संस्कारो की तलाश है| यथा इस्तिथि वाद, स्तुतिवाद और नियोजित अभिशंषावाद दरकेगा | थोपे हुए राजनैतिक सांस्कृतिक और आर्थिक ठहराव भी छुटेगा ही इतिहास की चुप्पी टूटेगी और कविता इस कार्य में सहायक ही सिद्ध होगी | यदि यह विश्वास कविता लिखने की पयाप्त वजह तो कोई भी बहन , कोई भी वजह पयाप्त नही है |

इस संकल्प का प्रकाशन राजस्थान साहित्य आकादमी से पाडुलिपि प्रकाशनार्थ मिले आर्थिक सहयोग के कारङ संभव हो साख है| मैं विनम्रता पूर्वक अकादमी के अदयच डॉ. प्रकाश आतुर और संचालिका के सभी सदस्यो के प्रति अपनी कृत्यता व्यक्त हु| हिंदुस्तान कापर परिवार के मुखिया श्री राम शंकर मिश्र ने मुझे सदैव स्नेह दिया है| अतः ह्रदय से उनका राढ़ी हु| मैं हिंदी साहित्य परिषद् , खेतड़ी नगर से सम्बन्ध कवी मित्रो अवं खेतड़ी टर्म स्कूल के कार्यपालक निर्देशक श्री म. च. दत्त व् अन्य साथियो के प्रति भी आभार व्यक्त करता हु|

डॉ. हेतु भरद्वाज ने मार्गदर्शन और संरक्छण ही नही दिया वरण सहज स्नेहवश समय समय पर मेरा मार्ग प्रष्ट भी करने की उदारता भी रति है| उनके प्रति मात्र कर्त्तयता व्यक्त क्र देना निश्चय ही अपयाप्तये होगा १ श्री इन्दर कुमार काकड़ प्रकाशन योजना में बराबर के भागीदार रहे है| किन्तु मैं उनके पार्टी आभार व्यक्त करना आवश्यक नही समझता|

मेरी पत्नी श्रीमती संतोष त्यागी , परोछ रूप से ही सही मेरे रचनाकर्म की भी सहचरी रही है| नेरे पुत्र देवेश त्यागी, नगेश त्यागी, पुत्री अलका त्यागी और पुत्रात अजय त्यागी ने पांडुलिपि तयार करने का श्रम सधै कार्य किआ है | अतः मैं उन सबका उलेख करने के साथ साथ अपने अग्रज श्री अजीत सिंह त्यागी का उलेख करना अनिवार्य समझाता हु| पाण्डुलिपि तयार करने मी साथी चंदभाल मिश्र ने सहयोग दिया , उनका भी आभारी हु| साथी वेदव्यास श्री तारादत्त निविरोध और श्री नन्द चतुर्वेदी से मुझे इसने मिला है| मैं ह्रदय से उनका प्रति कक्रतघ्ता और अपने मुदुक श्री रामगोपाल मिश्र आदित्य का धन्यवाद गपँ करता हु|

संकलन में मुदं के कुछ दोष रहना स्वाभिक है | विश्वास है पाठकगण अन्यथा नही लगे|


राजवीर त्यागी
खेतड़ी नगर
निराला जयंती २३ जनवरी १९८८