काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"

है यही कामना

श्री रामशंकर मिश्र - १९ जनवरी १९८८

श्री राजवीर त्यागी ताम्र-परिवार के उन सृजनशील सदस्य मैं है जिन्होने खनन और धातुकर्म की दुनिया मैं रहकर भी विलछण काव्य-प्रतिभा तथा लेखन के प्रति अटूट निष्ठा के बल पर नयी पीढ़ी के रचनाकारों में विशिस्ट स्थान बना लिया । श्री त्यागी रचनाकारों के उस वर्ग का प्रतिनिधीत्व करते है, जिनके लिए लेखन आजीवका नहीं, बल्कि अपने भावो और विचारो को धारधार ढंग से व्यक्त करने का अचूक माध्यम है । खेतड़ीनगर में रहते हुए मैंने अनेक छोटे-बड़े साहित्यिक समारोहों मैं श्री त्यागी के प्रभावशाली काव्यपाठ को सुना है । इस बार इनकी कवितो ने अपनी ताजगी और खुरदरेपन के कारण अन्य श्रोताओ की तरह मुझे भी झोझोरा है और जीवन की नयी दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित किया है । यही कारण है की राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से इनके काव्य संकलन "ठहर गया है समय" का संकलन मेरे लिया वयक्तिगत रूप से एक सुखद समाचार है
"ठहर गया है समय" की अधिकतर कविताएँ मेरी सूनी हुई है । चाहे वे छंदमुक्त कविताए हो या गीत या ग़ज़ल श्री त्यागी की सोच और अभिवक्ति के कुछ न कुछ नयापन जरूर रहता है । ये कविताएँ परंपरागत संस्कार और जीवन यथार्थसे एक साथ झूज रहे भारतीय आम आदमी के दुःख -दर्द से हमारा परिचय कराती है । मैं श्री त्यागी की इस सतह इस्थापना से सहमत हूँ की कवि न तो रोटी रजाई और मकान है न नारा ही । कविता मानवीय संवेदना के यह सार्थक अभिवक्ति है जो समाज के बेतहर मार्ग के बेहरतर ढांचे का मार्ग त्रास्त करती है इस संकलन का सही आकंलन तो काव्य मर्मग्य हे करेगे । मेरे लिये यही हर्ष और संतोष की बात है की जिस विरवे को मैं पिछले एक दशक से अपने इसने से सीचा है उसका पहला फल समाज के सामने है । मैं कामना करता हूँ की श्री त्यागी निरन्तर सृजनशील रहकर अपनी कृतियों सेवांग्देवी के भंडार को समृद्ध करते रहे

मैंने उसको जब भी देखा

श्री इन्द्र कुमार कक्कड़ - खेतड़ी नगर

'भाव की डोली लिए द्धारे खड़ा है काफिला
तुम बहर से , कथ्य से।, विन्यास से बातें करो ।

और मैं उस शक्श की जिन्दगी की बहर , कथ्य व विन्यास की बात करूंगा जो विगत सात सालों से मेरी जिन्दगी का एक हिस्सा बना हुआ है । मैंने उसकी सख्सियत के अनेक रूप - रंग देखे है । दफ्तरी जिंदगी में अनुसंधान और विकास विभाग में कार्यरत रसायनज्ञ जो विष्लेषणात्मक रसायन शास्त्र की गुत्थियों से उलझा है । एक मध्यवर्गीय आदमी जो अपनी चादर और पैरो के अनुपात की विसंगति जी रहा है । संस्कारों से चिपका एक सीधा सपाट, गैर दुनियादार आदमी जिसने अपनी भावना छुपाना न तो सीखा है न सीखेगा । एक हमदर्द दोस्त जो दूसरे का दुःख दर्द तो गहरे तक महसूस करता है परन्तु खुशी में भागीदारी जरूरी नही समझता । कभी बहुत मुखर और संवेदनशील तो कभी प्रतिक्रिया शून्य । हर समय कोई न कोई व्यस्तता ओढ़े हुए । कुरेदने पर कोई न कोई नाराजगी या पराजय बोध भी मिल जायेगा । मैंने उसे लिखने पढ़ने के साथ हिंदी साहित्य परिषद् के संयोजक, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा ) की स्थानीय शाखा के महासचिव , उत्तरांचल परिषद् एवं दूरदर्शनं ज्ञानदीप मंडल खेतड़ीनगर की धुरी के रूप में काम करते देखा है और मैं उसकी संस्थागत प्राथमिकताओ के लिए व्यक्तिगत प्राथमिकताओ की उपेक्षा कर सकने वाली निष्ठा और लगन का कायल ही हुआ हूँ । सुना है जब तक वह ट्रेड यूनियन एक्ट के दायरे रहा तब तक मजदूर संगठन में भी सक्रिय रहा । यह मेरी और उसकी मुलाकात होने से पहले की कहानी है । मैं उसे जोर -जुल्म से सीधे -सीधे टकराते लोगों के साथ नहीं देख पाया । रोजी रोटी के लिए खुरजा (उ० प्र ०) से मास्टरी के पेशे से जिंदगी की शुरुआत करने वाला यह शख्श शायद दसवीं जमात से कवि बन गया था । उसके भीतर घुमड़ता हुआ धुआं ही शायद उसकी प्रेरणा का स्र्तोत रहा होगा । उसे सव्य -सांची, सुरेश कौशिक, निर्धन, उमाकान्त शर्मा, अश्वघोष धनंजय सिंह जैसे लोगों का साथ मिला । इसी दौरान वह नाटक की बारीकियों से भी वाकिफ हुआ । ..... बेहतर जिंदगी की तलाश उसे खेतड़ी कॉपर काम्प्लेक्स तक ले आई और वह पत्थरो की ख़ाक छानता -छानता मुकम्मल कवि बन गया । मैं इस शख्श को कविता का कम्प्यूटर कहू तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । मुझे अक्सर उसकी इस खूबी पर रस्क हुआ है और उसे प्रायः हर कवि की ढेरों कविताएं याद है । कवि चाहे पहाड़ी हो, मुक्तिबोध, निराला दुष्यन्त हो या धूमिल, वह बीस -बीस पँक्तियों की लम्बी कविताएं बांच सकता है । यह खूबी उसे कवि सम्मलेन के संचालन में महारत बख्शती है । और शायद यही वजह है कि संचालन की दावते उसे बाहर से भी मिलती रहती है । मैं रस, छंद विहीन रचना को गद्य से ज्यादा नहीं मानता, इसका नजरिया मुझसे जुदा है । इसे छंद या बेछंद से कुछ फर्क नहीं पड़ता । कविता का शव्द विन्यास सटीक और शिल्प भर बेहतर होना चाहिए । वह 'रसक्रम व्याकम काव्यम ' जैसी मेरी दलीलों पर पलटकर पत्थर मारता है :

जिंदगी रसहीन है तो / मैं कागज पर / गन्ना नहीं निचोडूगा
छंद के लिए ईमानदारी नहीं छोडूंगा ।
मेरा उद्देश्य / किसी पाश्व गायिका का गला नहीं है
मेरा लक्ष्य कुछ भी हो लालकिला नहीं है ।

उसकी हर नयी कविता / गजल सबसे पहले मुझे सुननी है । वह राय भी मांगेगा और बहस भी करेगा । तसल्ली की बात यह है कि अन्त मे हम दोनों प्रायः एक मत हो जाते है । या तो कुछ परिवर्तन लेता है या मुझे कोई नई व्याख्या मिलती है । नये - नये शव्दों का प्रयोग भी उसकी विश्लेषता है :-

अगर रसना कही विष सतत संचार करती है
वहाँ मन में अमर्षण के घने जंगल रहे होंगे ।

समझौता न करना उसकी मजबूरी है और उपेक्षित होना उसकी नियति । लोग उसका इस्तेमाल कर अक्सर किनारा कर जाते है । वह ऐसे वाकयात की चर्चा से बचता है । मैं इस लिए उसे पसन्द करता हूँ । मैं समझता हूँ ' जो लोग जान बूझकर नादान बन गये, मेरा ख्याल है कि वह इंसान बन गये । 'उसका बयान है कि "मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं कवि नहीं हूँ परन्तु यह कमजोरी मुझे अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार से वंचित करने की पार्याप्त वजह भी तो नहीं ," साबित करता है कि उसे अपने बारे में कोई गलत फहमी या खुश - फहमी नहीं है। हाँ, विद्यार्थी जीवन से ही वामपंथी विचारधारा से प्रवाभित यह व्यक्तिवाद समाजबाद को हर बीमारी की दवा और सामाजिक परिवर्तन के यकीन की खुशफहमी को जरूर ढोता है। वह जो मानता या जिसे मानता है समूचे मन से मानता है जो नहीं मानता बिल्कुल नहीं मानता। आधे - अधूरे जैसा कोई हिसाब - किताब नहीं, उसके पास। मैंने उसे कभी वर्तमान को जीते नहीं देखा। वह जो जीना चाहता है, उसकी कोई रूप रेखा उसके पास है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। हाँ आम आदमी के दुःख दर्द का परचम जरूर उठाये रखना चाहता है, मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार लोगों की मानसिकता पहिचानने के बावजूद,

जीते आप सदी अगली में , हम आदम युग में जिन्दा है
हमें पता है आप हमारे जीने भर से शर्मिन्दा है।

मैं इस संकलन की प्रकाशन योजना में पाण्डुलिपि की तैयारी से ही भागीदार हूँ। साथ - साथ 'मरुगंधा' का सम्पादन करने के अतिरिक्त हमने कुछ वर्ष पहले संयुक्त रूप से 'कुछ अनायास, कुछ सप्रयास ' का सम्पादन भी किया था। बहरहाल, अपने दोस्त की पाण्डुलिपि सामने है और मेरे मन में उसकी पंक्तियाँ हैं -

कभी - कभी ऐसा लगता है/जैसे मैं जड़ सकता हूँ
इन टूटे बिखरे कांचो को जोड़ जोड़कर
मैं अपने को ताजमहल सा गढ़ सकता हूँ

यह किताब उसकी इच्छाओं का ताजमहल भले ही न बने एक उम्दा किताब जरूर बनेगी, वह प्रायः लिखता ही रहता है । हाँ निहित संभावना जब कभी सोने की हुई है, मैंने उस पर पत्थर फेंका है :

जब भी सोने लगी कोई संभावना
एक पत्थर उसे मारकर चल दिये।
हम भविष्य में भी अपना-अपना काम करते रहेंगे, संभवत: तो,
कीजिये रुखसत कि अब होने लगा है झुटपुटा,
दोस्त का कूंचा है जिसमें से गुजरना है हमें।

इन कविताओ को पढ़ते हुऐ

डॉ हेतु भरद्वाज

आज हम जिस तरह के कठिन समय से गुजर रहे है उसमें कविता भले ही एक गैरजरूरी सी चीज लगे परन्तु यह भी सही है कि समय की कारगुजारियों को एक सही नजरिये वाला कवि ही न केवल भेदने का साहस कर सकता है प्रत्युत इन कारगुजारियों में सार्थक हस्तक्षेप भी कर सकता है। इस लिए आज के कवि के लिए जितना जरूरी अपनी कविता को कलात्मक ऊंचाईयां देना है उतना ही जरूरी उसे जीवन के सहज प्रवाह को रोकने वाली शक्तियों के खिलाफ सार्थक हस्तक्षेप कर सकने योग्य बनाना भी है। परिणाम स्वरुप कवि - कर्म न केवल दिनोदिन जटिलतर होता जा रहा है बल्कि सोद्देश्य कर्म भी बनता जा रहा है। इस सोद्देश्यता का अर्थ न तो प्रचारात्मक उपदेशात्मकता है और न ही कि कविता के कलात्मक मूल्यों की अवहेलना, परन्तु यह भी तय है कि समय के प्रश्नों से बचकर निकल पाना आज के कवि के लिए आसान नहीं रह गया है।
जब कवि अपने समय के प्रश्नों की आकुलता को अपने अन्दर महसूस करता है तो उस आकुलता को व्यक्त करने के लिए उसके पास एक मात्र औजार है - शब्द। यह कवि की अपनी सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि वह इस शब्द के द्वारा कितनी दूर तक समय के प्रश्नों से टकराता है और इन प्रश्नों का समाधान भी खोजता है।
कवि राजवीर त्यागी की प्रस्तुत कविताओं को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा कि इन कविताओं का कवि न केवल समय की अकुलाहट को गहराई से महसूस कर रहा है बल्कि वह शब्द की सामर्थ्य से भी बखूबी परिचित है। कवि कर्म उसके लिए ऐसी साधना है जो उसे अपने से इतर जीवन और उसके सवालों से जोड़ती है।

क्योंकी साधना रास्ता भर है / उपलव्धियों से बेखबर है
साधना पाना नहीं खो जाना है/अपने सिवाय सबका हो जाना है

(कमल, सृजन और साधना)

राजवीर त्यागी का कवि अपनी काव्य साधना के जरिये अपने को दूसरों में तब्दील कर देना चाहता है। इस तब्दीली का मकसद समय की धार में मरते - खपते आदमी को बचाना और जिंदगी के स्पंदन को जीवन बनाये रखना है। इस कवि की कविताओं सामर्थ्य इसी मैं है, कि बहुत सा दुःख व्यक्त करती हुई समय की सारी विसंगतियों को उजागर करती है। इन कविताओं की चिन्ता मुख्य केन्द्र आदमी है - वह आदमी जो न जाने कितने तनावों, दबावों, अंतर्विरोधों और जड़ताओं के बीच मर - मर कर जी रहा है। वह आदमी के खिलाफ चल रही साजिशों की पराजय के प्रति भी आश्वस्त है और पूरी ताकत से आदमी को नापने के मौजूदा घटिया पैमानों और मानदंडों का विरोध करता है।

भूलते हो दोस्त ! मैं आदमी हूँ / आदमी कसे नप सकता है लीटर, मीटर। क्विन्टल में / कैसे खप सकता है।

(पैमाने )

इन कविताओं का कवि पूंजीवादी व्यवस्था के छल को बखूबी समझता है। जिसके लिए आदमी को केवल उत्पाद भर और वह मन चाहे ढंग से इस्तेमाल कर सकती है। सामान्य जन की नियति यही है कि वह उन लोगों हाथ में वस्तु मात्र बनकर रह गया है। जिनका जीवन के लिए जरूरी सभी साधनों पर अधिकार है। कवि इस नियति के साक्षी और भोक्ता भी है -

खीसें निपोरना दुम हिलाना / सलीब पर सलीब लदवाते जाना ढोते रहना, नियंता के चरणों को धोते रहना ।

(अनुशासन)

वर्कशॉप खुलते ही यंत्र चलित जुड़ते है
मेहनतकश - हाथ, अधरों पर
त्वमेव माता च पिता त्वमेव का
समर्पण उगता है, मेरुदंड झुकता है

(इसी तरह)

अपने परिवेश को चित्रित करती हुई इन कविताओं के कवि की इस मेहनतकश के साथ सहानुभूति ही नहीं है प्रत्युत वह उसकी नियति को बदलने के लिए बेचैन भी है। आदम विरोधी व्यवस्था के पंजो में जकड़े सामान्य जन की नियति को बदलना कोई सरल काम नहीं है। इस लिये आदमी की लाचारी और विरोध न कर पाने की विवशता और हताशा के बिम्ब भी इन कविताओं में उभरे है।

हम स्वयं नहीं जानते, अपनी उदासी और ख़ुशी की वजह
बहुत सी बार, जानते भी है तो तय नहीं कर पाते
स्वीकारें या नकारें केवल मुस्करा दें। या पलट कर पत्थर मारें
किस तरह पेश आयें / अपने घाव का इलाज करें /
या दूसरों जख्मी बनायें।

(जरूरी गैर जरूरी )

कवि यह भी जानता है कि उसके लिए जरूरी क्या है ? फिर भी विधमान अमानवीय स्थितियों में जो खोज, गुस्सा और आक्रोश उत्पन्न होने चाहिएं वह सब इन कविताओं में है। कुल मिलाकर इन कविताओं का प्रमुख स्वर अस्वीकृति और आक्रोश का है जिसका होना बहुत स्वाभाभिक भी है, आक्रोशी मुद्राओं के कारण इन कविताओं में व्यंग्य की पैनी धार भी है। दरअसल जीवन की विद्र पताओं को रेखांकित करने और उन्हें समाप्त करने के लिए कवि के पास केवल व्यंग्य ही सबसे सार्थक और कारगर हथियार बचता है। राजवीर त्यागी के पास व्यंग्य की बहुत बड़ी जमीन और तीखी व्यंग्य क्षमता है, जो आज की स्थितियों पर गहरा प्रहार करती है। हमारे यहाँ व्यंग्य को भाषा के स्तर पर ही ज्यादा लिखा गया है जब कि व्यंग्य की असली ताकत का पता तब चलता है जब वह कथ्य में से स्वयं फूटता है। राजवीर त्यागी की अनेक कविताओं में व्यंग्य कथ्य में से स्वतः उभरा है और यही उसकी सफलता है। उदाहरण के लिए उनकी 'खैरियत का ख्याल कविता' ली जा सकती है।

भेड़ियों के रहम पर /मेरी तरह जीना। स्वयं में
क्रूरतम अहसास है / खैरियत का ख्याल / बस विद्रूप है, उपहास है
भेड़ियों के बीच / आत्मा रहती नहीं है देह रहती है
थकी - निचुड़ी / ओढ़ कर नोंची हुई चमड़ी।

इन कविताओं में आज की क्रूर व्यवस्था पर प्रहार है, तो दूसरी ओर सामान्य जन की बेचारगी का तीखा अहसास , संग्रह में इस तरह के सार्थक व्यंग्य पर्याप्त मात्रा में विधमान है।
पहले रचनाकार के पास परम्परागत मूल्यों का एक ढांचा था जिसको आधार बनाकर वह अपनी बात कह सकता था, परन्तु सारे परम्परागत आदर्श और मूल्य झूठे साबित हो चुके है। इसलिये हमारे समय के रचना - कर्म की चिन्ता में नये मानवतावादी मूल्यों की स्थापना भी शामिल है। आज के कवि - कर्म की मात्रा नये मूल्यों की खोज की मात्रा है। मूल्यों के संक्रमण का यह दुःख - दर्द और नये मूल्यों की तलाश की बेचैनी राजवीर त्यागी की कई कविताओं व्यक्त हुई है :

मेरी चेतना / लाटरी और लूप / राशन की, किराशन की
दुकानों में / कहीं गुम हो गई है / और मुझसे क्या सभी से
कौम से, परिवेश से और देश से / पहिचान उसकी खो गई है।

(खोई पहिचान की तलाश)

राजवीर त्यागी का कवि मशीनों के बीच से अपना रास्ता खोजता है। वह जानता है कि यह मशीनी - सभ्यता आदमी को किस प्रकार वस्तु में बदलने का उपक्रम कर रही है और इस मशीन -तंत्र में सर्वहारा की वर्तमान दयनीय नियति के लिए जिम्मेदार कौन है ? इन कविताओं के कवि ने अपने विम्ब और प्रतीक उसी मशीनी दुनिया से चुने है और उनका सफल प्रयोग अपनी कविताओं में किया है :

हम सबकी की चेतनाएँ/फाइल के धागों में / कस -कस कर जकड़ी है,
मुट्ठी में पकड़े है/ हम सब ने पेट/ मेरु पर चिपके है अनगिनती टेप

(कारावास)

राजवीर की भाषा भी उन्हीं जीवन स्थितियों से उपजी है जिनका चित्रण उसने अपनी कविताओं में किया है। इस प्रकार उसकी कविताएं अपने परिवेश को जीती है। कहीं सरल प्रतीकों और विम्बों द्वारा, कहीं सपाट बयानी द्वारा उसने अपनी बात कही है। उसकी कोशिश रही है कि उसकी बात पाठक तक पहुंचे और उसका अपेक्षित असर भी हो। शायद इसलिये कवि गीत और ग़जल की ओर भी मुड़ता है। यह भी हो सकता है कि मशीनी दुनिया से ऊब कर रागात्मकता की ओर मुड़ता हो गीत और ग़जल को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता हो। पर गीत और ग़ज़लों में भी उसकी संवेदना जीवन की विद्रू पताओं उधेड़ने में ही लगी रहती है :

हैं बड़े भारी कई पत्थर हमारे आस - पास,
बाद एक के दूसरा सीने पे धरना है हमें।

संक्षप में राजवीर त्यागी पास वह धारदार दृष्टि है जो व्यवस्था के षडयंत्रो को समझती है और उसके लिए कवि - कर्म बेहतर मानवीय व्यवस्था लाने की संघर्ष - पूर्ण कोशिश है। उसके पास समर्थ भाषा में अपनी बात कहने का अपना तरीका है। शब्द उसके लिये अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं प्रत्युत पाठक तक पहुचने के सार्थक और कारगर औजार है उसकी कविता के शब्द अनुभव की भट्टी में तपकर निकले हुए प्रतीत होते है। और यही तपे हुए शब्द राजवीर त्यागी को एक प्रासंगिक कवि बनाने का काम करते है।
कवि राजवीर त्यागी का यह पहला संग्रह है। उसका स्वागत। पर कविता की यात्रा कभी खत्म नहीं होती, जीवन की यात्रा की तरह। इसलिए मैं कवि राजवीर त्यागी से यह आशा करता हूं कि वे अपनी सृजन - यात्रा को अनवरत रखेंगे और निरंतर बेहतर लिखने की कोशिश करते रहेंगे क्योंकि अन्ततः रचनाकार को उसका लेखन ही जीवित रखता है और निरंतर बेहतर लिखने की कोशिश ही उसकी असली कोशिश होती है। इत्यलम।