काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - अनुशासन

अनुशासन क्या है ?
मुझे मालूम नहीं
इतना सीखा है / कि
देश , प्रदेश , दफ्तर , स्कूल
सड़कों , कारखानों और गलियों
सभी जगह
इसका पालन जरूरी है ।
अनुशासन ,
स्कूल में भी नहीं पढ़ाया जाता
कोई नहीं कहता
कि इसे शिक्षा का विषय बनाया जाए ,
जब कि यौन -शिक्षा को
जरूरी बताया जा रहा है
नाटक, कविता , कहानी लिखना
फिल्मों में काम करना
बहुत सी जगह
सिखाया जा रहा है ।

अनुशासन क्या है ?
मुझे मालूम नहीं ,
अनुशासन के नियंता जो कहते है
यदि वही अनुशासन है तो
उसका अर्थ है
सहमे - सहमे रहना
'जी हां ' कहना
खीसें निपोरना
दुम हिलाना ,
सलीब पर सलीब
लदवाते जाना
ढोते रहना
नियंता के चरणों को धोते रहना
अनुशासित होने की प्रक्रिया
एक साधना है ।
जिसमे आत्मा के चप्पल
नियंता को पहनानी पड़ती है
खींसे निपोर कर
क्रोध , छोभ और घुटन
छिपानी पड़ती है ,
किन्तु / जब यह प्रक्रिया चुक जाती है,
तो / भक्त और भगवान की
दूरी मिट जाती है।
साधक महान हो जाता है,
उसे अनुशाशन का
ज्ञान हो जाता है।
तब वह दूसरों को अनुशासित करने में
नियंता का हाथ बटाता है,
अनुशासन की ज्योति
देश , प्रदेश , दफ्तर , स्कूलों
सड़कों, घर गलियों
कारखानों में पहुँचाता है
जो विश्व -विद्यालय नहीं कर पाते
वह करता है,
अनुशासन के लिये जीता है
अनुशासन के लिये मरता है

धीरे - धीरे नियंता
जड़ होने लगता है
साधक को भार सौप
सोने लगता है
यों भक्त भगवान से
आगे बढ़ जाता है
साधक का चश्मा
नियंता के चढ़ जाता है।

कालान्तर में
साधक की वाणी ही
अनुशासन हो जाती है,
पुरानी परिभाषा
अतीत में खो जाती है।
इस तरह अनुशासन
भारत के संविधान की तरह
संशोधित हो जाता है,
नये संदर्भो से
नयी व्याख्याओं से
पोषित हो जाता है।

हमें,
परिभाषा के पचड़े में
नहीं पड़ना हैं
केवल इतना करना है,
कि अनुशासन के आम को
गिनना नहीं
खाना भी नहीं
केवल ढोना है,
और बदले संदर्भो में
बदली व्याख्या अनुसार
अनुशासित होना है।