काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - बेगुनाह खून

लीजिये ,
मैं समेट रहा हूँ , अपने प्रश्न -चिन्ह
इसलिए नहीं
कि तुमने इन्हे हल कर दिया है ।
इन्हे दोहराना व्यर्थ है ,
तुम्हारे माप दंडो से
टकराना व्यर्थ है,
इनका तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा
उलटे लोग मुझे ही
अवांछित और असामाजिक कह रहे है ,
और तुहारी हर व्यवस्था
खुशी -खुशी सह रहे है ।
तुमारी पिस्तौल का "चैम्बर " भरा है
जेलों मैं बहुत से जगह खली है,
इसलिए मैं
सामाजिक बंनाने मैं
इतनी रूचि दिखा रहा हूँ
जान बूझकर
अपने साफ सुथरे प्रश्नचिन्ह
हटा रहा हूँ , किसी प्रस्न का समाधान
गोली या जेल नहीं है
समाधान से इनका
कोई मेल नहीं है ।

सुनो ।
साफ सुथरे प्रश्नचिन्ह
यु ही नहीं उगते
इन्हें पैदा करने वाले को
खपना पड़ता है
तुमने कभी अकेले जागकर रात नहीं गुजारी
गुजरना भी मत
बड़ी घबराहट होती है ,
तब जाकर किसी वजनदार प्रश्न की
पैदायश होते है ।
और उसके फोरन बाद शरु होता है दुदिनो का सिलसिला ,
हल के तलाश मैं घूमो
खोजी कुत्तों की तरह ,
जगह जगह सूंघो
सड़क और गलियो की
लंबाई का पता लागू
भटक भटक कर अपना समीकरण
सबको समझाओ ।
अपने प्रश्नों को नापो -जोखो
खुद लुहार की धोकनी बनकर
इन्हें तपाओ ,
खुद मारो
पर इन्हें मौत से बचाओ
लोगॉ के आँख मैं खटको
चारो और से उपेछित हो,
अपने ही प्रश्नों पर
अपना सर पटको ।

मैंने ऐसा जीवन जिया हैं
निरंतर घृणा, कपट और अलगाव का विष
पिया है
आज भी
षडयन्त्रो के चक्रवयूह मैं
जी रहा हूं ।
यह खून टपक दो
रक्तबीज जन्मेगे
वयवस्था टूटेगी
अस्तित्व चारमरायेगे ,
इतिहास के पन्ने तब तक केवल मुझी पर
उंगली उठाएगे ।
आज कही कोई उद्देश्य नहीं
किसी को कुछ भी नहीं अखरता
समाधिस्थ भ्रकुटी तो तानते है
लेकिन अधरों पर
समर्थन नहीं उभरता ।
उफ !
मेरे साफ़ -सुथरे प्रश्नों का
अस्तितिव ढह रहा है
कोई पूछता तक नहीं है
यह बेगुनाह खून
क्यों बह रहा है ।