काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - कच्चे दूध की गंध

शहर की सभ्यता में
सब कुछ खप जाता है
आदमी नहीं खपता
खोटा सिक्का
अच्छे दामो में
चल जाता है
आदमी नहीं चलता
क्योकि आदमी सीना ताने खड़ा रहता है
और किसी का खड़ा रहना
शहर को बर्दाश्त नहीं।
शहर सभी को गिराना चाहता है
बिछाकर सो जाना चाहता है।

शहर को मालूम है
पका हुआ सेब नीचे गिरता है
इसलिये उसे उठा लेता है,
हर गिरी चीज पचा लेता है।
गांव किसी का गिरना
नहीं सह पाते
इसलिये पका हुआ सेब
शहर को सौंपकर,
डाल पर लगे
कच्चे सेबों को
प्यार देते है
अपनापन वार देते है।
इतना ही फर्क है
शहर और गांव में
गांव गिरते नहीं
गिराते नहीं
गिरना पसंद भी नहीं करते।
शहर गिरना पसंद करता है
जो नहीं गिरते उन्हें गिरा देता है
हर गिरी चीज पचा लेता है
जो कोशिश करने के बावजूद
खड़े रहते है
उन्हें भगा देता है।

शहर संवेदनाएँ नहीं ओढ़ते
अखबारों को बेच डालते है ,
आदमी संवेदना ढोता है
इसी से संक्रामक होता है
इसे पलने और पनपने दिया जाय /तो
गजब ढा सकता है,
पूरे के पूरे शहर को
आदमी बना सकता है।
इसी लिये/शहर सब कुछ सहते है
आदमी को नहीं सहते,
जहां शहर रहते है
वहां आदमी नहीं रहते।

तुम्हारे शहर का रहस्य जान गया हूँ
मुझे गिराना चाहता है
बिछाकर सो जाना चाहता है
गिरूंगा नहीं खड़ा रहूँगा
बढ़ते दवाब के बावजूत
अड़ा रहूँगा
मैं गांव की डाल पर लगा
कच्चा सेब हूँ
जिसे तुम्हारा शहर तोड़ लाया है,
और मेरे गांव की शाख को
जख्मी छोड़ आया है।
मैं उसी शाख का प्रतिशोध हूँ
प्रतिशोध पर कोई नहीं
सो सकता,
मुंह में बसी कच्चे दूध की गंध
तुम्हारे शहर का
कोई पेस्ट नहीं धो सकता।