काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - सीता की समाधि

नभ कांपा, सिहरा वातायन
हिल गया दिशाओं का आसन
कुछ धूल - धुआं, कुछ अंधियारा
अवनि तल सारा का सारा
पत्ते जैसा कंपकपा उठा
कण - कण त्रण - त्रण
थरथरा उठा
निर्वासित सीता की संयम
क्या डोली सब सृष्टि डोली
वर्षों की मूर्तिमान पीड़ा
वैदेही के मुख से बोली
उस ओर सुता का दारुण - प्रण
यह घोर अनिश्चय धरती का
चौमुखी व्यथा, दोमुखा मरण
कृशगात मृदुलतम भाव
लाता सी कोमल व्रत ऐसा कठोर
कुछ और मांग तू वैदेही
वैदेही तू कुछ मांग और ।

कंपित धरती प्रस्तुत सीता
पल बीते, पूर्ण प्रहर बीता
पीड़ा से था अवरुद्ध कंठ
आनन पर छितरी व्यथा - व्यथा,
सौ टूक ह्रदय था इधर
उधर स्वपनिल स्वपनिल सी
जनक सुता।

वाटिका, वाटिका में रघुवर
नक्षत्रों में जैसे दिनकर
रोमांच हो गया अंग अंग
बजती हो जैसे जलतरंग
फिर धनुष भंग
फिर राम - वरण
स्मृति में कौंध गये वे क्षण।
यह वर्तमान रीता - रीता
बिन राम भला कैसे सीता
पुनि कहा धरा से एक बार
सीता पर हो माता उदार
जिस कोख जनम
उस कोख मरण
है यही श्रेष्ठतम महावरण।
शोकातुर कातर दीन -हीन
संताप ग्रस्त बूढ़ी माटी
कांपी परहीन कपोती सी कांपी
ओ क्रूर नियति के क्रूर जाल
ओ काल-चक्र की कुटिल चाल
ठहरो कुछ पल अनुकूल बहो
होनी के वज्र हृदय पिघलो
यह निश्चय बदलो वैदेही
वैदेही यह निश्चय बदलो।

धरती का यह अनुरोध अनसुना रहा
रहा रीता रीता
वन गमन हुआ स्मरण
चली राघव के साथ साथ सीता
फिर पर्णकुटी मायावी मृग
पौरुष हारा, छल भ्रम जीता
वन पर्वत - पर्वत राम फिरें
टेरें सीता, सीता, सीता
आकुल व्याकुल तज भूख प्यास
दिन रात ढूढ़ते धाम - धाम
सीता का हरण हुआ था
लेकिन लगता था खो गये राम।

फिर रावण से संग्राम, असीमित शक्ति
देवगण भी उदार
इस ओर मात्र संकल्प
इधर दुर्गम लंका वैभव अपार
यह घोर असंगति समीकरण
संतुलनहीन यह कैसा रण
लंकेश, साथ निःसीम सैन्य
अनगिन आयुध अनगिन योद्धा
कर दिये राम ने अनदेखे
केवल सीता का दुःख देखा।
लो थके राम शक्ति पूजन
हो जाना नीलकमल अपहृत
राघव का क्षोभ नयन अर्पित
करने को हुए राम प्रस्तुत
यह नयन निहारें तो सीता
सीता के बिन जीवन रीता
फिर रहे न रहे नयन मेरे
घहरे तम और अधिक घहरे
हठयोग हठीले राघव का
सारी दुनियां से अलग थलग
कब राम सिया से अलग हुए
कब सिया राम से हुई अलग
फिर बदला दृश्य जानकी के
सम्मुख आया फिर वर्तमान
खो गया कहीं पर दिवा-सपन
रावण - वध , लंका विजय
और फिर अग्नि - परीक्षा
राम मिलन।
सीता में पलता राम अंश
फिर सीता का वन ओर गमन
सीता पर वज्र गिरा
आहत हो गये उधर राजीव नयन
यह लोकलाज यह मर्यादा
यह कैसा निर्मम व्रत - पालन
खुद सीतामय हो गये राम
सीता को देकर निर्वासन।

दो मुखी व्यथा
अपनी सीता
किस भांति सहे
किस भांति कहे
निर्वासन संताप इधर
टूटे टूटे से राम उधर।
परित्यक्ता सीता की पीड़ा
पीड़ा से जीर्ण - विदीर्ण ह्रदय
नभ से क्यों गाज नहीं गिरती
होती किस कारण नहीं प्रलय
धरती के वज्र ह्रदय में भी
पड़ती किसलिये दरार नहीं
स्वीकार नहीं में राघव को
क्या तुमको भी स्वीकार नहीं ?

जल उठो दिशाओ !
अग्नि देव !
यह आहुति स्वीकार करो
ओ महाकाल वैदेही पर
इतना सा तो उपकार करो
वैदेही का दारुण-विलाप
ज्यो व्यथा स्वयं हो मूर्तिमान
आकृति मलीन विदीर्ण-हृदय
यह कैसा निष्ठुर अनुष्ठान

प्रस्तुत सीता कंपित धरती
क्षण-क्षण जीती कण -कण मरती
नभ कंपा , दिशाएँ उथल -पुथल
फिर धुआ धुआ, फिर कोलाहल
लो फटा धरा का ह्रदय
हुई माटी की लीला पुर्णकाम
पांचो तत्वो में विलय हुई
वैदेही रटती राम - राम
लो चली तुम्हारी वैदेही
अन्तिम बेला, अन्तिम प्रणाम
माटी की लीला पूर्ण काम
हे राम राम, हे राम राम
हे राम राम, हे राम राम