काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - परम्परावादी कवि - मित्र के नाम

मुझे फुर्सत भी मिली तो उस वक्त ,
जब तुम्हारा मरता हुआ कवि
दूर किसी कवि - सम्मेलन में
गा रहा है ,
तुम्हारी प्रेमिका की भाव-भंगिमा
और मांसल देह के सहवास ने
तुम्हे जो कुछ दिया है,
हर मिलान से पहले
बिछुड़न के बाद
और इनके बीच
तुम दोनों ने
जो कुछ जिया है ,
उसे भुना रहा है
यानि कच्ची उम्र वाले श्रोताओं पर
कहर बरसा रहा है।
तो, मुझे इतना समय मिला है
कि/तुम्हारे आरोप पढ़ लिए है
मुझ में लय, गति , छंद और रसिकता
नहीं है ,
मैं जो लिखता हूँ
वह कविता नहीं है।

अफसोस है दोस्त
तुम सामने होते तो
तुम्हारी खोपड़ी की सड़न
धोयी जा सकती थी,
उगती तो नहीं
थोड़ी सी अक्ल
बोयी जा सकती थी।

मेरी कविता,
आँसू जैसे सरल तरीके से
निकल कर नहीं बहती ,
मुझे प्रसवा की भांति
जननी पड़ती है।
मैं जल कर चीखता भी नहीं
जले पर बरनोल लगाता हूँ ,
जलने - जलाने पर
अपना नियंत्रण
स्थापित करने का
अभियान चलाता हूँ

कविता रोटी नहीं है
जो खायी जा सके ,
कविता रजाई नहीं है
जो ठिठुरते हुओं को
उढाई जा सके ,
कविता मकान नहीं है
जिसमें भीड़ घुसायी जा सके,
कविता नारा नहीं है
जिसे भीड़ से
दोहरवाया जाता है
कविता वह चीज नहीं है
जिससे आन्दोलन
चलाया जाता है ,
कविता वह चीज नहीं है
जिससे आन्दोलन
चलाया जाता है,
कविता मंजिल नहीं है
मंजिल तक पहुँचने का
रास्ता है, मेरी मंजिल से
तुम्हारा क्या वास्ता है
क्यों कि मेरी मंजिल
गदराये शरीर के साथ
सो जाना नहीं है
स्वीकृतियों के बाहों में
खो जाना नहीं है ,
मेरा उद्देश्य
किसी पार्श्व-गायिका का
गला नहीं है
मेरा लक्ष्य कुछ भी हो
लाल किला नहीं है।

मैं तुम्हारे आरोपों का
कारण नहीं जानता,
लेकिन,
मैं तुम्हें प्रतिद्वन्दी नहीं मानता।
बड़ा अन्तर है दोस्त
मैं लिखता हूँ
तुम गाते हो,
तुम मेरे रास्ते में कहां आते हो।
हां मैं तुम्हारे भाव जगत से
डरता हूँ
कोरी कल्पनाओं से
नफरत करता हूँ ,
मैं कठोर सत्यों की धरती पर
रहता हूँ
मैं और मेरा पड़ोसी
जो भोगते है
सोचते है
वही कहता हूँ ।

मैं किसी रस का कवि नहीं
जिन्दगी का कवि हूँ
ऐसा कवि
जो कभी भी
कवि -कर्म से नहीं कटता ,
जिन्दगी रसहीन है
तो मैं कागज पर गन्ना नहीं निचोड़ूंगा,
छद के लिये
ईमानदारी नहीं छोडूंगा।

तुम शरीर में रस देखते हो
मांसलता में छंद पाते हो
सहवास की चुनौती को
गति मानते हो ,
रति की कविता की
नियति मानते हो।
मैं प्राणों में रस देखता हूँ
आत्मा में छंद टटोलता हूँ
संघर्ष को गति मानता हूँ ,
जिन्दगी का कवि हूँ
जिन्दगी का महत्व जानता हूँ।
तुम स्वीकृतियों पर चढ़े हो
रेत के महल पर खड़े हो
तुम्हें इसी में 'सब्र' है ,
तुम्हारा लेखन
निरउदेश्य सफर है।

मैं बिना टिकिट यात्रा नहीं करता
अपने लक्ष्य तक जाना चाहता हूँ ,
सोई हुई कौम को जगाना चाहता हूँ
ऐसी दृष्टि बोना चाहता हूँ
जो तुम्हारा और तुम्हारे पुरखों का
बनाया भ्रम जाल तोड़ फेंके
अंधियारे का अस्तित्व नकार सके,
मरघटी माहौल में
तड़फती जिन्दगी को
दर्द से उबार सके।
मैं कुछ ऐसा पाना चाहता हूँ ,
साफ - साफ कहूँ
सूरज उगाना चाहता हूँ
और /जब तक सूरज नहीं उगता
अंधियारे से लगातार
टकराना होगा
जो घबरा रहे हैं
उन्हें भी रराहत पहुँचानी होगी,
और तुम
जो तटस्थता का स्वांग रच
अंधियारे की मदद कर रहे हो,
तुम्हें भी
गद्दारी की कीमत चुकानी होगी।

जानता हूँ ,
तुम पके पान हो
परन्तु मैं /तुम्हें
कुछ और जिलाना चाहता हूँ ,
रास छंद और लय की वास्तविकता
दिखाना चाहता हूँ
इन्तजार करो दोस्त !
स्वीकृतियों का
उमर बढ़ाने वाला
टॉनिक पियो,
कुछ दिन और जियो ,
विश्वास करो
अँधियारा छटते ही
गीतांजली लिखूंगा,
वायदा करता हूँ, सच्चे मन से
श्रदांजली लिखूंगा,
अभी व्यस्तता
लिखने नहीं देती
तुम्हारा महत्वहीन होना
मेरा कसूर नहीं है ,
थोड़ी देर ठहरो दोस्त
अब सुबह बहुत दूर नहीं है।