काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - नियति

बादलों पर लागू नहीं होता
जड़ों का प्रावधान
बावजूद इसके
इन दिनों , बहुत साफ नहीं है आसमान
मैं , कभी रिसते जख्म-सा
दुखता हुआ
कभी अहसान समझकर
उपकृत होता हुआ
कंधों पर उठाये डोलता हूँ
तुम्हारे कदमों के निशान।

ढोये जाने के अभ्यस्त
भाप बनते है तो
अकारण हवा की आंख नम करते है
बदल बनते है तो
सूरज को ढांपने का उपक्रम करते है
बोझे , सीढ़ी दर सीढ़ी
ऊपर चढ़ते है
कन्धों को किश्तों में घायल करते हुए ,
सिलसिले वार
निर्धारित निरापद योजना अनुसार
प्रशिक्षित पर्वतारोही
कम है, अभी भी
जबकि कन्धों की बहुतायत ने
झुठला दिये है
भीड़ के सभी पुराने कीर्तिमान।

कन्धे जितने अधिक
इस्तेमाल में आते है
घाव उतने ही फैलते है , गहराते हैं
यहां तक कि बोझे,
उन्ही में ठहर जाते हैं
भाप और बादल बनने तक।

बादलों का न तो अपना रंग है
न कोई आकार
न तयशुदा विन्यास है
इनकी तलाश है
एक कन्धा,
रूप और आकार पाने के लिये
उड़ने मंडराने के लिये
एक गडढा :
भरने के लिये।
भाप और बादल बनने तक
ठहरने के लिये।

कन्धे बदलती बूँद
उड़ती है, तिरती है
आखिर छोड़े हुए गडढों में ही
ठहरती है
दोबारा ईमान बदलने तक
भाप और बादल बनने तक।

बोझे, पानी, बादल , भाप
आप है आप
मैं हूँ गहरा घाव, कंधा
कभी दुखता हुआ
कभी निहाल होता हुआ
जिसका न तो कोई भविष्य है
न ही वर्तमान।
तुम पर लागू नहीं होता
सुनिष्चत आकार,
तयशुदा विन्यास
अथवा जड़ों का प्रावधान
तुमने तय कर दी है
दोनों की नियति
गति और दुर्गति की सीमा तक।