काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - पैमाने

पता नहीं कैसे थे तुम्हारे पूर्वज तुम्हारे हाथों में
घटिया पैमाने
पकड़ा कर चले गए।
और कैसे हो तुम लोग
उन्हीं पैमानों को
अब तक लिए फिरते हो
जानते हो, यह पैमाने
सिर्फ बौने ही नहीं
इन पर गलत निशान लगाए गए हैं ,
और उल्लू की लकड़ी की तरह
तुम्हारे सिर पर फिराकर
तुम्हे खेतों, खलिहानों ,
दफ्तर, स्कूल, कारखानों में
छोड़ दिया गया है।
जहाँ तुम इन्ही पैमानों से
सब कुछ नाप रहे हो,
मुझे भी नापना चाहते हो,
गलत निशानों से
आंकना चाहते हो।

भूलते हो दोस्त !
मैं आदमी हूँ
आदमी कैसे नप सकता है
लीटर, मीटर, क्विंटल में
कैसे खाप सकता है
कौन बर्दाश्त करेगा
गलत नपना ,
इसलिए मैंने तुम्हारे हाथों का
पैमाना तोड़ दिया था
तुम्हे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था ।
क्योंकि, तुम गिड़गिड़ाने लगे थे
पैमानों के पक्ष में
पुस्तकें दिखने लगे थे ।
तुम्हारी किताबें भी
तुम्हारे पुरखों की मक्कारी की
कहानी कहती हैं,
ज़िन्दगी के हर प्रश्न पर
मौन रहती हैं ।

तुझे समझाया गया था,
यहाँ किताबें भी
पैमानों की तरह की
दूसरी जालसाज़ी है ।
प्रेमचंद, निराला, गोर्की .. ने
जो कुछ लिखा है,
उसमें इन पैमानों की बात नहीं है ।
बड़े धूर्त थे / तुम्हार पुरखे
गलत पैमानों के साथ- साथ
गलत किताबें भी थोप गए ,
हृदयहीन अपनी ही पीढ़ी पर
'मीथेन ' रोप गए ।
तुम भी मान गए थे,
तुम्हारे साथ जो "फ्राड " हुआ है
उसे जान गए थे ।
लाकें फिर वही
टूटे पैमाने जोड़ लाये हो ,
और मेरी चेतावनी
'डस्ट -बिन ' में
छोड़ आये हो ।
सुनो ! गलत माप
खुद तुम्हे मिटा सकती है
औसत पसंद पटवारी की तरह
तुम्हारा भी कुनबा डूब सकते है ।

इस तरह नापना
मैं भी कब तक सहूँगा ,
उचित है
गलत नापना छोड़ दो
दिवालिये पैमाने तोड़ दो ,
अन्यथा मुझे तोड़ने पड़ेगे
तुम्हारे हाथ मरोड़ने पड़ेगे ।
ताकि तुम
टूटा पैमाना
फिर न जोड़ सको
गलत नापना भूल जाओ ,
सचो लो
जिद करना
गजब ढा सकता है,
वह दिन,
कभी भी आ सकता है