काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - वियतनामी प्रेमिका का पत्र

डरी हिरनी की कातर आँखे -सी
भीगी धरती
गूगा भरा आकाश
विगत की हुई बात,
निर्माण -सर्जन में व्यस्त
बीतता है हर दिन ,
कुछ और नए सपने अर्पित कर
ढलती है हर एक रात ।

जिस ठाव गुजरते थे , पिशाच
बचपन किलकारी भारत है ,
यौवन लेता है अंगड़ाई
बूढी नानी की लोरी में
नाना का अनुभव झरता है ।
बारूद हटाकर चमक रहे
कोमल अखुए लोलीत-ललाम,
जो कल था जर्जर जीर्ण -शीर्ण
अब अभिनव मेरा वियतनाम ।

जब तन पर था हावी विषाद
दुख की कालिख से दग्ध प्राण
तब तुम्हे चाहा प्यार किया
पुरे मन से ,
जब खीज हो गयी थी
अपने ही जीवन से
आभार तुम्हारी चाहत का
लज़्ज़ावश होता व्यक्त नहीं
प्राणों में होती है रिम -झिम
रोमांचित होती ही काया
मन में पलाश से खिलते है ,
जब कभी कल्पना के उपवन में
हम तुम दोनों मिलते है
साँसों में बजती है सरगम
ओ दूर देशवासी प्रियतम ।

जाने वह कैसी धरती है
जिस पर लेने को जन्म
देव तरसे होंगे ,
वह कैसी धूलि है कि
जिसमे खेल-खेल
जसुदा मैया के बालकृष्ण
हरसे होंगे ।
वह कौन भाव
जिससे प्ररेति हो गौतम ने
सारे सुख सब सुविधाएं
ठकराई होगी
वह कैसी चूड़ामणि थी
जिसकी देख देख
भगवान राम की आँखे भर आयी होगी ?
मातृत्व लांछित रहे रही
इस हेतु भारत /सात हाथ गहरे
खड्डे मै सोता था
आहुति नारीत्व देख
वैशया के चरण पकड़
जिसलिये विवेकानंद
फूटफूटकर रोता था
क्या आकर्षण होगा राखी धागों में
रोमांचित हुआ जिसमें वेधर्मियो का
गात हुआ
'बेस्ट है देव जहाँ नारी का पूजन हो'
इस महामंत्र पर
अब कैसे आघात हुआ ?

सुनती है तेरे भारत में
नारीत्व सताया जाता है
दिन के पुरजोर उजाले मैं
शहरो के गलियों , सडको पर
लांछित और अपमानित करके
निर्वस्त्र घुमाया जाता है
नारी जो कल तक श्रद्धा थी
नारी जो कल तक राखी थी
अब काम तृप्ति का साधन है
व्यापार कही है और कही
केवल कुर्षितत्व विज्ञापन है ।
सावत्री , सीता , सुलोचना के भारत मैं
नारी के संग अब ऐसा रौरव दुराचार,
अख़बार थक है छाप -छाप कर
शील हरण के समाचार ।
घर , गली मोहल्ले, सड़क
या कि हो अस्पताल
विद्यालय , देवालय तक रक्षित नही रहे
उद्योग और सचिवलय भी आज सुरक्षित नहीं रहॆ ।

यह घोर पतन का लक्षण है
शायद मनु के पुत्रों में अब
बाकी पुरुषार्थ नहीं रहा ,
ओ दूर देशवाशी प्रियतम !
मुझको तो ऐसा लगता है
भारत, अब भारत नहीं रहा।

मनमानी करते हो क्लीव
पौरुष तांडव से डरता हो ,
उत्पीड़ित नारी का विरोध ही
उनको मात्र अखरता हो,
ऐसी नापाक हरकतों से भी
ले यदि रक्त उबाल नहीं ,
मुर्दार्नी की इससे बढ़कर
हो सकती अन्य मिसाल नहीं।
व्यापक अर्थों में
दुराचारियों के वह संगी - साथी है ,
शोषण है आम जहां
उस धरती पर सब ही अपराधी है।

मैं भी नारी हूँ
और तुम्हारे भारत में
नारी जाति के लिये रहा स्थान कहाँ,
जिसकी बहिनें उत्पीड़ित हों
उस अबला का
बचा रह गया अपना भी सम्मान कहाँ।

तुमको चाहा वह केवल बेजारी थी

अब घृणा है
यह भी शायद लाचारी है
अहसानों का बोझ शीश पर
अलग बात
पर सच तो यह है कि
नारी आखिर नारी है।
कुत्सा ने क्षत - विक्षत
कर डाला प्राणों को
फिर कैसे
टूटे सपनों का श्रृंगार करूँ ,
जिस धरती पर
हो नारी का सम्मान नहीं
उस धरती के साजन से
कैसे प्यार करूँ ?
फिर ,
दुराचार के दामन योग्य
तुम में पुरुषार्थ नहीं रहा
दुर्भाग्य कि मेरे प्रियतम का भारत
अब भारत नहीं रहा।
आंसू से भीगा आंचल है
सीने में है सौ-सौ दरार ,
ओ कल के प्रियतम औ संबल
अब तुमको मुझको नहीं प्यार।