काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - मैं ना जुड़ा तो

कभी-कभी तो
हर परिचित से कतराने को
बचकर दूर निकल जाने को
मन होता है
और कभी ऐसा लगता है
जैसे मैं अपना पूरा बिखरा इंसान
विचारों का उठता तूफान
सबके सम्मुख रखदूं ।
कभी-कभी तो
अब कुछ शेष नहीं आकर्षण
फिर किस लिए खरीदूं, व्यथा
यह आलोचना प्रत्यालोचना
सोच-सोच कर
फिर से जुड़ने के विचार से
काँप-काँप उठता है तनमन
और यूँ ही रिसते रहने को
मन होता है
कभी- कभी ऐसा लगता है
जैसे मैं भी जुड़ सकता हूँ
इन टूटे बिखरे काँचों को
जोड़-जोड़ कर
मैं अपने को
ताजमहल सा गड सकता हूँ

कभी-कभी तो
ऐसे ही टुटा रहने को
या फिर और टूट जाने को
मन होता है
और कभी ऐसा लगता है
मेरे सम्मुख प्रश्न खड़े हैं
कितने विधुर आभाव पड़ें हैं
मैं न जुड़ा तो
ये अनदेखे रह जायेंगे
क्योंकि दूसरे
दृष्टि बचा कर गुजर रहें हैं,
गुज़र जायेंगे ।