काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - दरवाजा

दरवाजा जोड़ता है - दुनियां से
बशर्ते खुला हो।
खुले हों ,
खुले दरवाजों में बन्द आदमी
नदी के पुल की तरह आर - पार
बहाव को रोके नहीं ,
नमी को जिये भर, सोखें नहीं।
मैं कुछ ऐसे दरवाजे जानता हूँ
जो कभी बन्द नहीं हुए
उढ़काये नहीं गये
उसमें बन्द आदमी , यद्यपि
कभी ;खुले नहीं पाये गये।

क्या तुम्हे नहीं लगता
कि ये खुले दरवाजे
कभी -कभार बन्द हो पाते
तो इनमें बन्द आदमी
मुमकिन था ,
थोड़ा बहुत खुल जाते ?
मैंने ऐसे दरवाजे के बारे में / पढ़ा है
जो भुतहा मकान - सा
शताब्दियों से बंद पड़ा है
उसमें बन्द आदमी मगर
उधडी जिल्द वाली पुस्तक - सा
खुला हुआ पड़ा है।
खुले दरवाजे के पीछे आदमी का बन्द होना
या दरवाजे के पीछे आदमी का खुलना
बराबर का बेमानी है
एक जगह पुल भर है , पानी नहीं
दूसरी जगह
पुल बिलकुल नदारद
पानी ही पानी है।

सुना है , खुला दरवाजा
स्वागत करता है
बन्द विपरीत भाव दर्शाता है
बन्द दरवाजा मुझे इस पर भी भाता है
क्या तुम नहीं मानते / कि
बन्द दरवाजा
कहीं न कहीं झांकने की
लालसा जगाता है ?

खुले में देखना,
भीड़ की आँख हो जाना है
न खुद सिरहना है
न ' पश्य ' को ही गुदगुदाना है
झाँकना, दृश्य को आत्मसात करना है
बूँद - बूँद पीना है
जोगी का जुड़ना है
साधक का समाधिस्थ होना है
दर्शक का
एक रूप होना है।

बन्द आदमी के दरवाजे
उढ़काये भर होते है
थपथपाते ही खुल जायेंगे
आवरण , एक - एक कर घुल जायेंगे
खुलने को बन्द हुआ आदमी
झांकते ही बहने लगेगा
फिर खुले आसमान सा
खुला - खुला रहने लगेगा
झांकना, खुलने को सुनिश्चित करता है
खुले की बजाय
बन्द दरवाजा मुझे
आकर्षित करता है।