काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - नेतृत्व के नाम : एक पत्र

जब तुमने इंकलाब बोला'
तो मैंने 'जिंदाबाद ' बोला
तुमने बोला
अफसरशाही , नौकरशाही , तानाशाही
तो मैंने मुर्दाबाद कहा ।
इस तरह सभी संघर्षों में
मैं सदा तुम्हारे साथ रहा
कब कतराया ?
पहली पंक्ति में नहीं
दूसरी पंक्ति में भी नहीं'
बीच की पंक्तियों में तो रहा ,
जो कुछ सहना था
जैसे तैसे सहा ।
जब बीत गए अभियान
तुम्हे , दरबारों में
शामिल होने का मान मिला
महफिलें सजाने लगे
तुम्हारे द्वारे पर
प्रशश्ति गाने लगे
समय के साढ़े आग
और आश्चर्य !
जिनके खिलाफ संघर्ष
किया करते थे हम
तुम / उन मूल्यों को गले लगाने लगे ।
जिनके बारे में था तुमको विशवाश
सूंघकर सचाई
स्पष्ट बोल भी सकते हैं
जो चाटुकारिता के बासो पर चढ़ा
युयुत्सा की हत्या का
जाने का अनजाने में
घ्रान्तित षड़यंत्र कर रहे हैं
उनके खिलाफ
यह जुम्बा खोल भी सकते हैं ,
तुम उस ईमानदारी को
अपने आंगन से क्या
गली मौहले गावों तक से
दूर भगाने लगे
तुम्हारे द्वारे पर प्रशसित गाने लगे
समय के सदय अंग ।
इस तरह खेल में
स्वयं तुम्हारे आंगन में
दिवाला दाखिल बुद्धि
प्रतिष्ठित रही
तुम्हारे जीवन - तरु का तत्व
किसी परजीवी के मानिद
चुस्ती रहि।
उफ़ मित्र !
तुम्हारे त्यागों की बलिदानों की, उत्कर्षों की
सच यह है पूरी पीढ़ी के संघर्षों की
युग युग से / जानी रीति से ही
हत्या होती रही,
और तुम्हारे मंगल की इच्छा
निर्वासित होकर स्वयं तुम्हारे ही द्वारा
दूर मरघटों की मेड़ों पर
पड़ी हुई बस बेबस रोटी रही
इस तरह पीढ़ियां बीत गयी
मरघट कहता है क्रांति
सदा ही ऐसे मरती आयी है ,
लोलुप लोगों से घिरा
स्वयं की बैसाखी
नेतृत्व तोड़ता आया है,
कटता आया है अपने ही परिवेशों से
नभ विचरण के लालच में
यूँ ही धरा छोड़ता आया है ।
इस पंक्तियों में भी उसने
ठुकराया है
सहयोगी विश्वामित्रों को,
इतिहास सदा यूँ ही दोहराया
करता है
इन कथा वात्रयों को
चित्र - चरित्रों को ।