काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - विषधर

जानते हो विषधर !
विगत तीस वर्षों से
मैंने अपने भाग का पय
तुम्हे दिया है,
और तुम्हारी विषमय
फुंकारों का
हवा में धुला जहर स्वयं पिया है
तुम फूले हो
अपने पर केंचुली चढाई है ।
आशा के विपरीत
फुफ्कारों की संख्या
और विष की सान्द्रता बढ़ाई है।
उफ !
मेरे उद्यान की घास
झुलसती है
और अपने विष की सार्थकता पर
तुम्हारी छाती झुलसती है।
माना तुम विषधर हो
लेकिन हम विषपायी, नीलकंठ
धारेंगे गरुड़ रूप
लेलेंगे तुम सबको
क्योंकि
तुमसे सरलता की आशा व्यर्थ,
तुम्हे अजेय होने का
भ्रम हो गया है,
अकेले तुमको नहीं
पूरी नाग जाति को
लीलना आवश्यक हो गया है।