काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - सोये शहर का जागता आदमी

जिस शहर में
सब / बहुत सी पीढ़ियों से
सो रहे हैं'
मैं भटक कर आ गया हूँ
'औ अकेला जागता हूँ '
जबकि चरों और
सब सोये पड़े हों
तब अकेले आदमी का जागना
कुछ इस तरह से है
की जैसे खून करके
लाश के संग बैठना हो,
क्या करूँ, कैसे करूँ
मैं अकेला जागता जाऊं निरंतर
या की मैं भी सो रहूँ
किन्तु
जगते अकेले आदमी का
इस तरह सोना
कुम्भकर्णी नींद में खोना
सोते हुएहों के
जग न पाने से कहीं ज्यादा बुरा है
इसलिए केवल
अभी तक जागता हूँ
और इस सोये शहर को भी
जगाने में लगा हूँ ,
युगों से सोये हुएहो को
नींद से फुरकत दिलाना
फिर उन्हें जगते हुए
खुद देख पाना
बात अपने आप में
छोटी नही है
क्योंकि इससे
जागने का सिलसिला
आगे बढेगा
इस तरह जागते हुए इंसान को
इंसान फिर कैसे छलेगा ,
सिलसिला यह
शहर सारे को जगा देगा
नींद की हस्ती मिटा देगा
और उस दिन
इस अन्धेरी, योजनों लंबी
भयावह रात को
जाना पड़ेगा
और तब
जागे हुए इंसान को
आशीष देने
सूर्य को मेरे शहर
आना पड़ेगा ।