काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - इसी तरह

वर्कशॉप खुलते ही
यंत्रचलित जुड़ते हैं
मेहनतकश हाथ,
अधरों पर
'त्वमेव माता च पिता त्वमेव'
का संपन्न उगता है
मेरुदंड झुकता है।
उदर देवम् का
भरी भरकम व्यक्तित्व
बनावटी गंभीरता ओढ़े
नाक - भौं सिकोड़े
चुप चाप गुजर जाता है
मेहनतकश हाथ मानों
ऐसा प्रतिवेदन है
जिस पर विचार करना है
निहायत गैर जरुरी है
और सर्वम् देव देव
जीत जागता
'केन नॉट बी एसिडिङ टू ' है
अतः जिनके चेहरे पर
हिकारत जरुरी है
मेहनतकश चेहरों पर
सुबह सुबह जो भी थोड़ी बहुत
ताज़गी आती है ,
उसे यह हिकारत
सहज लीज़ जाती है
मानो हिकारत यह
'जैसे थे का फ़ौज़ी फरमान है '
जिसे हर सुबह दोहराया जाता है ,
मेहनतकश चेहरों से ओस की बूँद पोंछ
बे शबाब बासीपन चिपकाया जाता है ।
यदि इस प्रिक्रिया में है
कहीं पर थोड़ा प्रतिरोध नज़र आता है
तभी देव-देवम् का गात
धूधियाता है ,
मुँह से लपट उठती है
आँखों से शोले पर शोला निकलता है
मेहनतकश लोगों का
अंग अंग जलता है
अंतर्मन आहत हो
कांपता - चिल्लाता है
'त्राहिमाम्-त्राहिमाम् शरणागत्'
गाता है
तब जाकर तांडव का अवरोहण
आता है।
देवाधि-देव तब हुंकार भरता है
नथुने फड़काता है
मेहनतकश लोगों को दांत पीसपीस कर
दिन भर गलियाता है,
शोषण की नीति के पालन की प्रतिज्ञा
फिर से दोहराता है,
शराफत का नाज़ायज़ लाभ न उठाने से
खबरदार करता है
चुकी हुई पीढ़ी पर
होने वाले बच्चों पर
वर्तमान बीवी पर
खुला वार करता है
सारे दिन इसी तरह
उत्तेजित रहता है
और फिर संध्या को
ऊपर से देखो तो
शांत शांत लगता है
अंदर ही अंदर, किन्तु
भाड़ सा दहकता है
साईरन के बजते ही
मानो इस धरती का
चरम सत्य बकता है ।
'मेहनतकश का जीवन
भट्टियों मशीनों को
पसीना पिलाना है
घुट घुट कर जीना है
घिस घिस कर मरना है
जैसे और जितना भी
करने की आज्ञा है
ठीक-ठीक उतना ही, वैसे ही
करना है'
ताकि
पेट पलता रहे
बीवियां , बेटियां गर्भभार ढोती रहें
पीढ़ी दर पीढ़ी सेवार्थ, सुषणार्थ
शोषित की नस्लें उपलब्ध होती रहें ,
इसी तरह कृपा की कोर को
तरसती रहें
रोती रिरियाती रहें
मस्तक झुकाती रहें
रोज़ नाक घिसती रहें
देवाधि देवम् की
हर भावी पीढ़ी के
छल कपट के चक्कों में
बिना हील हूजूत के
इस तरह पिसती रहे ।