काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - जरूरी : गैरजरूरी

ज़रूरी तो नहीं
हर उदासी का कारण होना ,
अकारण भी
उदास हुआ जाता है कई बार ,
बहुत सी खुशियां भी होती हैं
बिना शबाब
मैं/उदास या प्रसन्न होने से पहले
कारण तलाशता भी नहीं
बस हो जाता हूँ
प्रश्न या उदास
कभी अनायास, कभी सहप्रयास
मौके के मुताबिक ।
जिन्हें मेरी प्रसन्नता
जिस अनुपात में अखरती है
उदासी उतनी ही सरसाती है
उसी हिसाब से पड़ती है
घोड़े पर चाबुक की मार,
लगान खींची जाती है
कभी दाएं कभी बाएं ।

अंतत: उदार हो जाते हैं
मेरे सरोकार
उनके सरोकार हो जाते हैं ।
हम स्वयं नहीं जानते
अपनी उदासी और ख़ुशी की वजह
बहुत सी बार
जानते भी हैं तो तह नहीं कर पाते
स्वीकारें या नकारें,
केवल मुस्कुरा दे
या पलट कर पत्थर मारें ।
कैसे पेश आएं
अपने जख्मों का इलाज़ करें
या दूसरों को
जख्मी बनायें

कल तुमने नाव को
वैश्या ठहराया था
भंवर की कीर्ति गायी थी
पतवार की उपयोगिता नकारी थी
और निष्ठा को
बेरहमी से गोली मारी थी ,
मेरी शख्शियत पर हावी है
निष्ठा का वही मुर्दा जिश्म
मैं इस लाश का क्या करूँ
कहाँ कहाँ लिए फिरूँ
किस तरह ठिकाने लगाऊं
इस बियाबान में
और तीन आदमी कहाँ से लाऊं ?

इतना आवश्यक नहीं है
दबाव को इकाई में बदलना
उदासी और बेचैनी की
बारीकियां समझना
खासकर उस वक़्त,
जब हम चाहते हैं
शब्दों को नपुंसक होने से बचाना,
सनातन
संगत पूर्ण निष्कर्षों तक पहुँचाना ,
तब बहस में उलझने की बजाय
घाव के इलाज़ के साथ साथ
जरुरी होता है
हाथ में पत्थर उठाना ।