काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - जमीन में गड़ा आदमी

हमेशा हमेशा के लिए
ठहर गया है समय
किसी गुमनाम कब्र में
दफना दिया गया है ऋतुचक्र
और सूरज सात घोड़ों वाले रथ में
बहुत ही व्यापक संदर्भों में
कभी का निर्वासित हो चुका है
हमारे लिये।

अब मात्र तुम्हारे लिये
बदलती है तारीखें
सहेजता और सरसाता है ऋतुचक्र,
मार्ग बुहारते है वर्ष,
प्रशस्तियाँ गाती है शताब्दियाँ
और तुम,
उल्लासित हो उंगलियों पर
जोड़ते हो हिसाब
कितने समय में
कितना आगे बढ़ा हूँ,
मैं इस जोड़ घटाने की जहमत से मुक्त
दशकों और शताब्दियों से क्या
आदमी के रूप में विकसित होने से
अब तक , जहां था वहीं खड़ा हूँ ।
तुम्हारी गणना की सुविधा के लिये
एक पत्थर की जरुरत थी
इसलिये जहां गाड़ दिया गया,
वही पर गड़ा हूँ।
गड़ना मेरी नियति हो सकती है
विवशता नहीं थी
इतना जीवन्त था मेरा पौरुष
कि गहरे बहुत गहरे गढ़ने पर भी
तुन्हारी ठोकी हुई मिट्टी
और जमाया हुआ कंकरीट
उखाड़ सकता था,
इतनी जररत थी पिण्डलियों में
कि तुम्हे क्या
समय को पछाड़ सकता था,
लेकिन मेरी बिडम्बना
और तुम्हारा सौभाग्य
तुम्हारे ही शब्दो में
मुझ पर हावी हो गया
आत्मा की तरह, केवल दर्शक होने का भाव,
या अपना सलीब
आप ढोने का आत्मघाती मोह
अथवा बेवजह शहादत की अर्थहीन लालसा
और आज
जब मैं /करीब - करीब जड़ हो चुका हूँ ,
मेरी चेतना/तुम्हारे तेजस की खुराक बन ,
उसे पुष्ट कर चुकी है ,
मेरा पौरुष कंडोम में कैद होकर
तुम्हारे नाबदान से बहाया जा चुका है,
खीसें निपोरने वाली तुम्हारी लालसाएँ
दुर्दभ्य उपलब्धियों में
रूपांतरित हो चुकी है
अट्टहास में अनुदित हो चुका है
तुम्हारा रिरियाता स्वर,
तो दरकने लगा है
मेरी सनातन आस्थाओं का 'एक्वेरियम'
' बह्म सत्य, जगत , मिथ्या,
तृष्णा, वासना, उद्विग्नता शांत '
लगने लगा है वाहियात
'कॉन्ट्रोवर्शियल' हो गया है
'धियो योनः प्रचोदयात'
सेप्टिक टैंक नजर आती है
बेवजह शहादत
या अपना सलीब आप ढोने की भावना।

मन होता है आटे की गोलियां और कांटे
नदी में उतार दूँ
गिरगिट की खाल ओढ़
रंग दिखाने लगू
कुत्ते की तरह दुम हिलाने लगू
भावना और मर्यादा
बलात्कारी दरिन्दों को सौपकर
जैसे भी हो
पुरस्कार पाने लगू।
इतना कर पाने में
हर कोई समर्थ है,
लेकिन संस्कारित शुचिता
क्या बिलकुल ही व्यर्थ है ?
और क्या इन्सानियत
बिल्कुल घिनौनी है ?
सर्वथा ताज्य है
अभिमन्यु का बलिदान ?
'सिस्यूफस ' होना बेहूदा विकृति है
धकियाना ही संस्कृति है ?
इन्ही प्रश्नों और चिन्ताओ से
टकराता
कण - कण भर रहा हूँ
बूँद - बूँद रिस रहा हूँ ,

विरोधी आकर्षण
और शत्रु -मूल्यों के बीच
पिस रहा हूँ।
खण्डित आस्था और भग्न विश्वासों का
तार -तार लबादा ओढ़े ,
दशको और शताब्दियों से नहीं
आदमी के रूप में विकसित होने से अब तक
जहां था वहीं पर खड़ा हूँ
तुम्हारी गणना की सुविधा के लिये
एक पत्थर की जरूरत थी
इसलिये जहां गाड़ दिया गया
वहीं पर गड़ा हूँ।
परिणामस्वरूप,
हमेशा -हमेशा के लिये
ठहर गया है समय
किसी गुमनाम कब्र में दफना दिया गया है

ऋतुचक्र
और सूरज सात घोड़े वाले रथ में
कभी का निर्वासित हो चुका है
हमारे लिये
अब मात्र तुम्हारे लिये
बदलती है तारीखें
सहेजता और सरसाता है ऋतुचक्र
मार्ग बुहारते है वर्ष
प्रशस्तियाँ गाती है शताब्दियां
तुम्हारे लिये
केवल तुम्हारे लिये।