काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

कविता - एक अदद देश

पूरे देश में , घर नहीं एक भी
कुछ मकान भर हैं
जहाँ से सत्ता , सोने और मांस की
तस्करी होती है ।
कुछ बाड़े हैं ,
जहाँ तेंदुए और चीते पाले जाते हैं
हिरनों के साथ -साथ ।

देश भर के मुर्दे ,
जलूस में शामिल हैं
बेदम नारों की ठठरी उठाये ,
यही होता है
मुर्दा , मुर्दे ही ढोता है
माँ - बहिनो को
अपेक्षाकृत असहाय छोड़कर ,
चीख़ने -चिल्लाने के लिये
या पसर जाने के लिए ।

चीख
ठठरी ढोते मुर्दे की हो
फुटपाथ के अंधरे की
पार्क के कोने से आये
झोंपड़ी चीखे
झुग्गी चिल्लाये ,
हवा में थरथराती हुई मरती है
दोबारा जन्म लेने के लिए
एक निश्चित अंतराल के बाद
उसी व्यग्रता से उभरती है ,
सिद्ध करती है /कि
यह मुरदार भीड़ जीती है
अभिव्यक्ति का अधिकार
टूट -फूट की विवशता के बावजूद ,
' भाषा बालिग हो रही हो रही है ' लगातार ।
पक्षाघात भोगते हाथ
चुनाव नहीं लड़ते
वोट डालते हैं
अंग -भंग संस्कारों को पीठ पर लटकाये
और लोकतंत्र को
पूरी तरह खलास होने से
बचाये रखते हैं

मैं , चीखते फुटपाथ
चिल्लाती झुग्गी
बेदम नारों
पक्षाघात जीते हाथों
लूले -लंगड़े संस्कारों को
हठ पूर्वक देश कहता हूँ
और खुश रहता हूँ ,
मेरे पास एक अदद देश है
भोजनाम , वस्त्राम हीन ,
जिसका होना भर
बहुत बहुत बेहतर है
देश के न होने से ।
मैं , इसे मन से जीऊंगा
बेहतर विकल्प के लिये
यत्नशील रहूंगा ।