काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"

परिचय - जगमोहन जावलिया

जन्म :- २३ दिसम्बर १९४०

जन्म स्थान :- शाहपुरा,जिला- भीलवाड़ा (राजस्थान)
शिक्षा- स्नातकोक्तर (भूगर्भ )
सम्प्रति- मुख्य भूवेक्ता,परियोजना प्रबन्धक,हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड
संप्रीत : सम्प्रति- मुख्य भूवेक्ता,परियोजना प्रबन्धक,हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड खेतड़ी नगर (राजस्थान)
रूचि : कविता सृजन, एवम कविता पाठन

सृजन

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विभिन्न परिस्थितयों में पलते रहने के क्रम में इनके होने के कारणों की मूलतः बारीकी से देखने की जीज्ञासा प्रारंभ से ही बनी रहने से बहुधा मन और मष्तिस्क मैं द्वन्द होते रहे है - जब जब बौद्धिक तत्व प्रबल हुए -मन ने सहयोग किया कुछ न कुछ स्याह सफेद अवश्य हुआ , किन्तु इसके विपरीत भावो के प्रबल पक्ष को उजागार करने के लिये तर्क और वैज्ञानिक आधार को नकार कर लिख पाना मेरे लिए दुस्कर ही रहा । अनुभूतियों को गुणदोष की फ्रेम मे कसकर ही देखा है - फिर प्रतिबद्धता क्यों और कैसे स्वीकार्य हो ! दोहन सापेक्ष है पर सत्य शास्वत , और इसीलिये दोहन किसी भी रूप में कितनी भी मात्रा में, किसी भी स्थिति में दोहन ही हैं और यदि रचना क्रम में कही भीइसे निर्वस्त्र नहीं कर सका तो केवल यथावत बनाये रखने की लाचारी का परिणाम है । शब्द मरे लिए काले हीरे है , यही काले हीरे दुर्घर्ष चट्टानों को तराशने और बींधने मै समक्ष है ! आखेटी घोड़ो की संख्या हर उपवन मे बढ़ी है खंड खंड होकर ध्वंस होते'हुए चूर्ण यदि एक खुर को भी नाकाम करदे तो खंड खंड होकर चूर्ण हो जाना भी सार्थक यात्रा है ! पलायन ' अंतिम पड़ाव नहीं है , निर्बलता से निबटने की एक अल्पकालिक मन: स्थिति थी - अभी तो महज अनेक है । शीशे तोड़ने है एक एक करके रूक रूक करके निरन्तर , तब तक -जब तक आरपार देखा जा सके !