काव्य संकलन - राजवीर त्यागी
    संकल्प, सार्थक एवम अक्षय प्रयास "दिवंगत श्री राजवीर त्यागी की यादो को जीवित रखने का"





काव्य संकलन - राजवीर त्यागी

गीत और ग़ज़ल - अक्षत रोली और चन्दन -चन्दन

भारत के भग्न अवशेष तुझे सौ बार नमन
मेरे आहत देश तुझे सौ बार नमन

तार डूबे , चंदा हारा, आपाधापी अंधियारा
सूरज की आंखें फोड़ गया, जगती को अंधा छोड़ गया
ऐसे पनपे काले धन्धे , निकले सब ज्योति कलश अंधे
इस घोर अंधेरी दुनियां में अंधियारों का निशि-दिन पूजन
उस ओर झोपड़ी में माटी के दीपक का अनवरत रुदन
इस ज्योति पर्व का अभिनन्दन , अक्षत रोली चन्दन-चन्दन।

कलुषित युग -धर्म , पतन, फिसलन
मेरे आहत देश तुझे सौ बार नमन।

सब राग - रंग, कन्दील , खील, इस लोकतंत्र ने लिये लील
बहरी सत्ता , गूंगी जनता, टूटा मन्दिर, खण्डित प्रतिमा
हर मंच - मंच , आसन -आसन , शकुनि दुर्योधन दुःशाशन
मेघा की नित अवमना और निष्ठा का हर दिन चीर-हरण
नित चक्रव्यूह का सृजन , शौर्य का वध विश्वासों का कंदन
इस लोकतंत्र का अभिनन्दन , अक्षत रोली चन्दन-चन्दन।

तन की टूटन, मन की दरकन ,
मेरे आहत देश तुझे सौ बार नमन।

बोझों से टूटी झुकी कमर, पावों में खण्डहर
ठन्डे चूल्हे , दहके शरीर , यह बेजारी, यह दर्द - पीर
घर से मरघट तक की दूरी , पूरी करने की मजबूरी
पसली की चटख, अन्तड़ी में कपड़े निचोड़ने सी ऐठन
हर ओर हिकारत, दुत्कारों के दानव का गर्जन - तर्जन
इस सर्वोदय का अभिनन्दन , अक्षत रोली चन्दन-चन्दन।

विभ्रम , शंका , भय की सिहरन ,
मेरे आहत देश तुझे सौ बार नमन।

सर पैर हीन कुछ दिवासपन, बुनते लाशों के लिए कफन
मर मर कर जीता है जब श्रम, लो आदमखोर हुआ मौसम
है कत्लगाह जैसे तेवर, देखेगा अगली कौन सहर
मरघट का विस्तार एयर स्वर्णिम भविष्य के आस्वाशन
सेवा का आवरण किन्तु शोषक - शोषित का समीकरण
इस नयी सुबह का अभिनन्दन, अक्षत रोली चन्दन-चन्दन।

कुंठित प्रतिमा, नित अधोगमन
मेरे आहत देश तुझे सौ बार नमन।